दक्षिण एशिया से हजारों किलोमीटर दूर यूरोप और भूमध्यसागरीय क्षेत्र में भारत निर्मित हथियारों की गूंज ने भू-राजनीतिक हलचल तेज कर दी है। दुनिया की सबसे घातक सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल 'ब्रह्मोस' (BrahMos) को खरीदने में ग्रीस और साइप्रस द्वारा दिखाई जा रही गहरी रुचि ने तुर्की के रक्षा गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। तुर्की के सैन्य रणनीतिकारों का मानना है कि यदि यह संभावित रक्षा सौदा हकीकत में बदलता है, तो पूर्वी भूमध्यसागर (Eastern Mediterranean) में दशकों पुराना शक्ति संतुलन पूरी तरह बदल जाएगा।
तुर्की के S-400 चक्रव्यूह को भेदने की क्षमता
तुर्की के प्रमुख रक्षा विश्लेषक अर्दान ज़ेंटर्क ने अंकारा की चिंताओं को उजागर करते हुए कहा कि मैक 3 (ध्वनि से तीन गुना तेज) की रफ्तार वाली ब्रह्मोस मिसाइल को रोकना मौजूदा वायु रक्षा प्रणालियों के लिए लगभग असंभव है। अपनी बेहद कम ऊंचाई पर उड़ान भरने की तकनीक (Sea-Skimming) और सटीक मारक क्षमता के कारण यह मिसाइल तुर्की के रूसी निर्मित S-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम के लिए भी एक सीधी और बड़ी चुनौती बन सकती है। तुर्की मीडिया के मुताबिक, साइप्रस इस सौदे में ग्रीस के लिए एक रणनीतिक मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता है, जिससे तुर्की के नौसैनिक अड्डों की सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी।
तुर्की के प्रतिद्वंद्वियों को भारतीय हथियारों की सप्लाई
तुर्की की परेशानी केवल ब्रह्मोस तक सीमित नहीं है, बल्कि वह वैश्विक स्तर पर भारत के बढ़ते रक्षा निर्यात से भी असहज है। भारत पहले ही तुर्की के घनिष्ठ क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी आर्मेनिया को पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट सिस्टम, आकाश एयर डिफेंस सिस्टम और आधुनिक ATAGS तोपें निर्यात कर चुका है। अब ग्रीस और साइप्रस के साथ भारत के प्रगाढ़ होते सैन्य संबंधों ने तुर्की की कूटनीतिक चिंताओं को दोगुना कर दिया है।
हथियार आयातक से निर्यातक बनता भारत
यद्यपि भारत सरकार ने अभी तक ग्रीस को ब्रह्मोस बेचने पर कोई आधिकारिक मुहर नहीं लगाई है, लेकिन फिलीपींस को मिसाइल की सफल डिलीवरी के बाद वैश्विक बाजार में भारतीय हथियारों की मांग तेजी से बढ़ी है। नई दिल्ली इस रणनीतिक निर्यात के जरिए न केवल अपने घरेलू रक्षा उद्योग को मजबूत कर रही है, बल्कि यूरोप में नए मजबूत साझेदार बनाकर अपनी वैश्विक भूमिका को भी पुनर्गठित कर रही है।